रामायण भाग - 20
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विभीषण से भेट (दोहा - छंद)
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कोने कोने ढूंढते , देखा घर तब एक।
राम नाम अंकित जहां, मिले यहां नर नेक।।
विप्र रूप धर हनु चले, संध्या का था वक़्त।
राम नाम लेते हुए, मिले विभीषण भक्त।।
हाथ जोड़ वंदन किया, हनुमत मेरा नाम।
निकला माँ की खोज में, करने प्रभु का काम।।
सीता माँ का हरण कर, रावन ने की भूल।
चुभती है ये बात यूँ, ज्यों चुभती है शूल।।
राम भक्त को देख कर, मन हो गया प्रसन्न।
जाकर अशोक वाटिका, कार्य करो सम्पन्न।।
Uma Vaishnav
मौलिक और स्वरचित