जब अतीत के नजदीक से गुजरता हूँ
फल की तरह पकी संवेदनाएं
झड़ने लगती हैं।
जो बातें जेब में थीं
जो बातें चाय की घूँट में निगल ली गयीं,
जो बातें पानी की तरह पी ली गयीं
जो बातें आँखों में स्थापित थीं,
जो बातें घूमने-फिरने में
ठिठक जाती थीं
जो बातें आन्दोलनों में प्रतिध्वनित होती थीं।
जो बातें खो जाती थीं हवाओं में
जो बातें मुड़ती थीं बार बार
जो बातें बैठ जाती थीं छाया में,
जो बातें चढ़ती थीं चढ़ाई
जो बातें नहीं भेद पाती थीं लक्ष्य
जो बातें भीग जाती थीं आँसुओं में,
वही सब जाने अनजाने
बहने लगती हैं मुझमें,
और मैं खारे समुद्र सा लहराता रहता हूँ इधर से उधर।
* महेश रौतेला