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हरतरफ देख लो तमाशा वही है रुलाये हरकोई, पर कोई हसाता नहीं है चिरागों की सोहबतों में रहें हैं हम येअन्धेरा हमें सताता नहीं है हाँ जमाना सता गया हमें इस कदर चराग रौशन करूं जी चाहता नहीं है पत्थरबाजों की आरजू जब हम हैं मेरे घर का पता क्यूं उन्हें बताया नहीं है कैसे आस्मां की ऊंचाई नापोंगें तुम पिजरें में कैद परिन्दा कभी उड़ाया नहीं है
वक्त गम दे गया जमाने भर का फरिश्ते रास्ता भुल गये मेरे घर का खुदा की महोब्बत में तुने राह के काँटे सब तो हटा दिये मगर लुत्फ खत्म कर दिया मेरे सफर का मेरे आँसुओं की कीमत बता जो तेरी चाह में बहाये मैंने हाथों में रखकर चलें गये वो प्याला जहर का जिंदगीभर के लिए मदहोश कर दो हमें जाम पिला भी दो न अपनी नजर का कलम थक चुकी है, और क्या लिखूँ फसाना लिख सका हूँ अपना बस पल भर का
घर की छत पे टहलने का मन करता है चाँद देखकर मचलने का मन करता है तुझे हमेशा यूँ शादमां देखकर अपनी सारी जागीर लौटाने का मन करता है हमनें लुटाये हैं सिक्के तमाशो पे बहुत खुद का तमाशा मुफ्त में दिखानेे का मन करता है खेल सांसों का हमे आ गया समझ खुद का जनाजा उठाने का मन करता है कैदी पिजरें के जो अरसे बंद उन परिन्दों का आस्मां दिखाने का मन करता है
बेहतर है अब हाल अपना किसी से कुछ नही मलाल अपना जवाब वही है भुला दिया है तुमको मत दोहराना फिर कभी ये सवाल अपना एक दीये की रौशनी ही बहुत है मेरे लिए मत उठा हिजाब, रहने दे ये जमाल अपना ना जाने क्या रंज हुआ सबको मुस्कुराने पे मेरे सबने कर लिया है तर रुमाल अपना लूटकर ले गये रास्ते के लुटरें मुझको तेरी तस्वीर ले गये छोड़कर सारा माल अपना सब परिन्दे उड गये ताली पे हमारी सय्याद बेजार चल दिया समेटकर जाल अपना
जितना सताना है सताले ऐं जिन्दगी इक दिन हमें मनाने में तेरे पसीने छुट जायेगें तप रहा सुरज ढल रहा है आग का गोला फिलहाल चाँद लग रहा है उसने प्याला जहर का उठाया और पी गया ये तमाशा देखा था घर के आईने में मैनें दिल बहलाने किधर जाऊं जिधर भी जाऊं उदास मंजर उदास करते हैं लहु टपकता है आंखों से तेरे और किजिए इश्क सच्चा किसी से
मैनें कई जन्म लिए हैं तेरी खातिर क्या इस बार भी तेरे बिना मर जाऊँगा मैं
बड़े काम का ये पत्यर निकला आकर लगा और दम निकला उठाकर प्याला पी गये हम भी जहर का था मुकद्दर खराब इतना उसमें मरहम का असर निकला
जिंदगी से कोई राब्ता भी न था जो साँस मैं ले रहा था उनसेें ठीक से वास्ता भी न था सिवा तेरे कोई तलब थी भी नहीं सिवा तेरे में कुछ माँगता भी न था हाथ छोड़ गये अपने मेरे जो हाथ पकड़े खड़े हैं उन्हें पहचानता भी न था जानता हूँ मैं इरादों को तेरे खंजर पकड़े खड़े हो दिल कांपता भी न था मेरी हसरत तेरे सिवा कुछ नहीं बाकी हसरतों में जानता भी न था दीवारों पे सजी मेरे खूँ की कसम मेरे कातिल कीे रिहाई के सिवा कुछ माँगता भी न था
हम अपने जख्म दिखायेगे नहीं जुबाँ दबा कर रखेगें शोर मचायेगें नहीं उठा के सर चल रहा हूँ ऐं मेरे खुदा गर झुका सर सजदे में तो फिर उठायेगें नहीं मत रुला खुद को ऐ मेरे सनम वरना हम भी कभी मुस्करायेगे नहीं गिरें थे बहुत दरख्त कल के तुफान में मर गये जो परिंदें, गिनायेगे नहीं बहा ले गया सैलाब जाने कितनो के घर अब कभी दरिया को देख जी बहलायेगे नहीं .
तारे फलक के सभी जगमगाने लगे चाँद निकला तो सभी के चेहरे मुस्कुराने लगे हमने उफ तक न की ये जाँ निकलने पे हाँ मर गये तब, जब रुठकर वो जाने लगे एक ठोकर क्या लगी उनकें पाँव को राह के तमाम पत्थर हटाने लगे अन्धेरों के खौफ से हमने जलाये थेे चिराग तनहा पाकर हमें ये उजाले सताने लगे मुझे घर याद आ गया परदेश में परिंदें लौट के शाम को जब घर को जानें लगे
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