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Feroj Khan

Feroj Khan

@ferojkhan.536289


तमाम रास्ता सुनसान नजर आया
सफर अपना बड़ा तन्हा नजर आया

इंसान लगे हुबाब की तरह
फुटा जो न फिर नजर आया

मैं कल का मतलब समझ चुका हूँ आज
रास्ते में जर्जर खण्डर जो नजर आया

डर रहा हूँ जमीं पे पड़े हर पत्थर से
खुद में जो एक पागल नजर आया

मैंने कोशा है चारागर अपना
जख्म अपना जब नासुर नजर आया

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खुशी वही है
जिसे हम बाँट सकें
- Feroj Khan

माँ
- Feroj Khan

दित में दर्द आबाद रहा अब तक
तुम्हें क्या मालुम कितना उदास रहा अब तक

इन रास्तों को मालुम है, हमपे जो गुजरी
पाँव में इक खार लिए चलता रहा अब तक

होंठ सीं चुका हूँ और क्या करता
मेरे बोलने पर बवाल रहा अब तक

नब्ज टटोली अपनी, तो ये मालुम हुआ
कुबूल न हुई मेरी, दुआ अब तक

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थोड़ा और सफर बढाओं मुसाफिर के लिए
सुरज से कहों, आज रहने दो कल डुब जाना

सोचा खुदखुशी करके देख लूँ
तेरे वादा की रस्सी चढ़के देख लूँ

मील के पत्थर को अपनी मंजिल समझकर
अधुरें सफर में खुद को रक्खा हमने

उस पेड़ की डाल पर परिन्दे जगागें रातभर
जिस पेड के नीचे सय्याद हो सोया

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चाँद भी दिखा तो खिड़की से
वे वजह छत पे उम्र गुजारी हमने

गिनों तारें रात भर
जो सो चुके वो ख्वाब गिनों


मेरी कश्ती डुबने ही वाली है बस
जरा और कुछ देर समंदर किनारे बैठो

हमने गुल उगाये हैं पतझड़ में
बहार लौटी तो चौंक पड़ी

जानें किस बात का सदमा है मुझे
रो पड़ता हूँ, कोई लतीफा सुनाकर

जिस जगह तेरा दामन उलझा पड़ा है
वहां दम तोड़ा था कभी रुमाल ने मेरे

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बड़े शौंक से पाले हैं हमने जख्म अपने
मरहम का मत पिंजरा देना इन्हें

मुस्किल हैं रास्ते तो क्या, आगे बढ़
रास्ता कट जायेगा तुफां से बातें करते करते

मेरा सर कटार पे रख दे, या कटार रख गर्दन पे
हमें तो मरने से मतलब है, तेरे हाथों

मेरी हसरतों ने खुदखुशी करली
मेरी हसरत ये थी के खुद को जिंदा रक्खूँ

इतनी भी क्या जल्दी है जाने की
मेरा कातिल पकड़ा जाये, चले जाना

होश में तो हो मयकदा है ये
पानी ढुढ़ईये उस दुकान पे जाकर


आप तनहा हैं मयकदे में
वजह, आप होश में हैं मयकदे में

हमें जीने की तलब ही कब थी
हम तो जमाने में सांसें ठुकराने आये थे

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मेरे घर के अंधेरे हार जाते
गर जो रुख से नाकाब तू हटा देता


मन जी उठा पुरानी तस्वीर देखकर
कुछ मेरे बचपन की, कुछ जबानी की

जो भी जीने का हक रखता है
चाहे हो वो मेरा कातिल

जिन्दगी पूरी पत्थर ढुढ़ने में लगा दी
आज मिला पत्थर, तो हाथ से पागल निकला

गुबार उड़ाओ चाहे जितना
सितम नहीं तो सफर कैसा

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गम की रात ढली तो थी
हाँ खुशी मिली थी, अलविदा कहने के लिए

गम, दर्द,चंद सांसें हैं बस मेरे पास
इसके सिवा क्या है, जिन्दगी तुझे देने के लिए

तमाम घरों की देहलीज से बेअदबी से ठुकराये गये हैं
मैं आ गया हूं तेरे दर पे इक और ठोकर खाने के लिए

शाम तो ढल जाने दो कम से कम
मैं बुझ जाऊंगा, चिरागों को जलाने के लिए

हमें कल का तुफां सता कर चला गया
आज, आप आये हो हमें सताने के लिए

क्यूँ गैरों को मैं,तकलीफ दूँ इस तरह
मैं भागता हुआ था अपना जनाजा उठाने के लिए

पीछे मुड़कर नही देखा,कम से कम सोचा तो
इतना ही काफी है मेरे दिल को धड़काने के लिए

खिड़की से आती धुप को अपने घर में पनाह दी है
एक सबाब की खातिर, सबाब कमाने के लिए

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दर्द अपना मेरे जख्म पे सजा दो
मरहम रहने दो बस मुस्कुरा दो

मुझे याद है अपना गाँव अपना घर
बस हमें तुम रास्ता दिखा दो

चाँद पे कदम रखने वालों
चाँद के दाग सारे हटा दो

अपने ही कत्ल का इल्जाम लगा मुझपर
ठीक है, हमें सूली चढ़ा दो

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