त्यागा तो त्याग ही दिया ,
वो त्यागना भी अच्छा था ,
भागी नही कभी ,मगर ! भागी थी,
वह भागना भी अच्छा है |
देखती हूँ अब बीच के हिस्से ,
जुड़े सपनो से हो गये किस्से |
धीरे-धीरे बाहर आ रही हूँ ,
इस छलती,बदलती दुनिया से ,
अब उकता रही हूँ |
जो छूटते गयें पीछे पाने की चाह भी
छूटती गई , शायद! यही है असल
जिन्दगी |