मन बहुत ख़राब है। सबको पता था, अभी भी सबको पता है। पर सब अपने-अपने टुच्चे स्वार्थों की पूर्ति के कारण चुप हैं।अकेला बोलता था,बोल रहा हूँ।मुझे प्यार करने वाले कहते हैं “आप क्यूँ इतना सच बोल-बोलकर सबको नाराज़ करते रहते हो ?”
समझ में नहीं आता आत्मा की सुनूँ या जैसा चल रहा है चलने दूँ