हम बात को कहानियों के माध्यम से ज्यादा अच्छी तरह समझते हैं। अलजेबरा, जियोमेट्री और डॉयग्राम हमें कम समझ में आते हैं। कहानियॉं चाशनी की तरह मीठी और सालन जैसी जायकेदार हो क्या कहना। लोग फौरन आकर्षित होंगे। खिचड़ी या मूँग की दाल टाइप नहीं चलेगी। धर्म और राजनीति में तो कहानियों का खूब बोलबाला है। बिना इसके संस्थागत धर्म और उनके कर्ता-धर्ताओं का काम नहीं चलेगा। फिर भी हमें यह भ्रम है कि कहानी मात्र साहित्य की एक विधा है।
मूर्धन्य रचनाकार भी अपनी कृतियों के बारे में पाठकों के अभाव पर खिन्नता प्रकट करते हैं परंतु मजाल है कि धर्म और राजनीति की कहानियॉं गढ़ने वालों को कभी पाठकों, श्रोताओं और दर्शकों की कमी का सामना करना पड़ा हो। आज अनेक कहानियॉं समान्तर चल रही हैं। परस्पर विरोधी कहानियों का सहअस्तित्व देखने का मिलता है। साम्यवादी कहानी का सर्वहारा वर्ग की तानाशाही, पूँजीवादी कहानी का मुक्त बाजार और व्यक्ति की स्वतंत्रता, धर्म-मजहब आदि के जन्नत वाला किस्सा, स्वर्ग-नर्क की कथाऍं, खूब प्रसिद्ध हैं। हम साहित्यिक रचनाऍं को चाहे मनोरंजन के विविध माध्यमों के चक्कर में उलझकर नजरअंदाज कर दे लेकिन दूसरे प्रकार की किस्से-कहानियों में हमारी रुचि जगत प्रसिद्ध है। आप चेखव, प्रेमचंद, बालजाक और डिकिन्स के नाम और कृतियों से अनजान हो तो भी कोई बात नहीं लेकिन अपने जिले और शहर के फलानां धार्मिक गुरु, क्षेत्रीय क्षत्रप या स्थानीय डॉन के बारे में जानना आवश्यक है। किताबें हमें आतंकित करती हैं लेकिन इन लोगों के वक्तव्य, नारे ओर विवाद हमारा अच्छा मनोरंजन करते हैं। टी.वी. चैनल उनसे जुड़े विवादों तक को प्रमुखता देते हैं जबकि साहित्य से संबंधित कोई समाचार उनकी वरीयता सूची में शामिल नहीं है। साहित्य राजनीति के आगे चलने वाली मशाल कही गयी है पर सच्चाई यह है कि राजनीतिक किस्से जनता के मन-मस्तिष्क को इस कदर प्रभावित करते हैं कि सारी चुनावी लड़ाई इसके बूते हारी और जीती जाती है। साहित्यिक गोष्ठियों और राजनीतिक रैलियों के बीच जनसंख्या के घनत्व में फर्क देखकर बहुत कुछ समझ में आ जाता है। दलों के चंदे की राशि और किसी साहित्यिक पत्रिका की प्रसार संख्या अथवा पुस्तक की बिक्री के मध्य विशाल अंतर काफी कुछ कहता है।