साँकल कितनी बार बजी हैं
डोली कितनी बार सजी है
कितनी उठीं कराहें दिल में
फिर भी साँस कहीं अटकी है
संवादों की खनक हरेक पल
जीजिविषा ही लेकर आती
प्राणों को अनुगुंजित करती
पल-पल ये ही हमें सिखाती
जीवन है ये ,चौकन्ना रह
हँस ले गा ले इसे मना ले
हंस को इक दिन उड़ जाना है
सबमें प्यार यहाँ बरसा ले
युद्ध नहीं कोई समाधान है
युद्ध से धरती ही वीरान है
समझ सोच ले पगले मनुवा
प्यार की बोली ही महान है
भूल गया क्यों संत कबीरा
ढाई अक्षर प्रेम बनाया
आँसू के बदले मुस्कानें
बेहतर हैं सबको समझाया !!
डॉ. प्रणव भारती