वेद वाणी 6-52-14
विश्वे देवा मम शृण्वन्तु यज्ञिया उभे रोदसी अपां नपाच्य मन्म।
मा वो वचांसि परिचक्ष्याणि वोचं सुम्नेष्विद्वो अन्तमा मदेम॥ऋग्वेद ६-५२-१४॥
पृथ्वी, आकाश, अग्नि एवं परमात्मा के समस्त स्वरूपों की हम स्तुति करते है। परमेश्वर एवं परमेश्वर के स्वरूपों को कभी भी अप्रिय वचन न बोलें। परमात्मा जो भी हमें देवें उसी मे सन्तोष कर प्रसन्न रहे।
We praise the earth, sky, fire and all the forms of the Supreme Soul. Never speak unpleasant words to God and the forms of God. Be content and happy in whatever God gives us.