परिभाषाएँ बदलनी होंगी (30.12.2021)
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क्या है धर्म ?
और क्या है अधर्म ?
कौन है संत ?
और कौन है असंत ?
क्या बदल रही हैं परिभाषा ?
संतों के मुख से गाली की भाषा ?
राष्ट्रपिता महात्मा गांधी को
सत्य, प्रेम अहिंसावादी को।
संतों ने जो गाली दी उनको
वो नष्ट करेगी ख़ुद संतों को।
तोड़ने की बात करे, वह धर्म कैसे ?
मार काट करता हो, वह धर्म कैसे ?
हिंसक विचार भी, होते थे अधर्म कभी
हिंसा करना भी, धर्म हो गया देखो अब। मानवता के द्वार, क्यूँकर हो रहे बंद
क्यूँ दानवता हो रही, धर्म पर हावी अब ?
खुले आम लगते नारे, नर संहारों के
तो क्यूँ बुलंद न हों, हौसले हत्यारों के।
सत्ता के प्रश्रय में, नर पिशाच हैं घूम रहे
धर्म के ठेकेदार अधर्मी, अहंकार में झूम रहे।
चापलूस और चाटुकार हो गया सारा तंत्र
ओम नम: स्वाहा देखो, हो गए सारे मंत्र।
सारे अफ़सर, दरबारी राग अलापें जब
अपराधी को गिरफ्तार, कौन करेगा अब?
जैसे तैसे तथाकथित संत गिरफ्तार हुए
देखो, कैसे कैसे बचाव पक्ष तैयार हुए।
इन संतों ने धर्म संसद भी बना डाली हैं
संसद में बैठे संत, गाँधी को देते गाली हैं।
दुनिया में पूजे जाते, राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी
उनके देश में आई कैसी, नफ़रत की आँधी ?
हिंदू मुस्लिम सिख इसाई, सब थे भाई भाई सबके बीच असंतों ने, बना दी है अब खाई।
मानव मानव से ही, क्यूँ अब डरने लगा है ?
सत्य अहिंसा प्रेम, क्यूँ अब मरने लगा है ?
संत असंत धर्म अधर्म, गडमड होने लगा है।
सत्ताधारी से विश्वास, गायब होने लगा है।
इस समय नव वर्ष का, उल्लास होना चाहिए था।
उत्सवों का पर्व हर जगह दिखाई देना चाहिए था।
एक ओर तो कोरोना, बार बार दस्तक दे रहा।
दूजी तरफ़ धर्मोन्माद, बीज विष के बो रहा।
हर शख्स के मन में डर कर गया है घर।
चाहे मुस्लिम हो कि हिंदू सब रहे हैं डर।
न ही सिख न ही इसाई हो पा रहे निडर।
जाए कहाँ कोई किस भगवान के दर पर?
नफ़रत की आँधियाँ, सब बर्बाद कर देंगी
भाईचारा देश का यूँ, सब तबाह कर देंगी।।
अहिंसा के पुजारी, पुन: अवतार ले लो तुम
इससे पहले कि, मानवता हो जाए कहीं गुम।
संत-असंत धर्म-अधर्म को, परिभाषित फिर से करना होगा।
सत्य अहिंसा और प्रेम को, सिंचित फिर से करना होगा।।
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अभिव्यक्ति - प्रमिला कौशिक
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