आज गली के एक नुक्कड़ पर चांद निकल आया।
आज उजाला और अधिक और सब के मन पर भाया।
आज गली के नुक्कड़ पर चांद निकल आया।
पहले से मदहोश और भी नीली थी आंखे।
बलखा कर चल पड़े तो देवता पानी मांगे।
सुरमई उसकी आंख। और घुंगराले बाल।
दिल की थी वो साफ और होठ उसके थे लाल।
न जानी ना समझी मैने ये उसकी माया।
आज गली के एक नुक्कड़ पर चांद निकल आया।
आनंद त्रिपाठी।
लेखक।