मैं तुम्हारे हृदय का मेहमान हूं।
क्या पता मुझको की मैं अनजान हूं।
हूं मुसाफिर आज भी उस राह का
जिस राह की तुम भी कभी भगवान थी।
बस एक टक और एक टक ही देखता।
जा रहा हूं उस सफर को मैं सदा।
तुम तो रानी हो। तुम्हारी हुस्न की।
मैं भिखारी बन गया हूं दर का तेरे।
एक नजर काफी है मेरे भीख में।
बस उसी से काट लूंगा मैं जहां।
आनंद त्रिपाठी
लेखक।