अंधी हूँ मैं! तू तो ,जगत देखती है , है कौन ? कैसा? तू सब देखती है | भरोसा न खुदपर तुझपर जो करती ,तेरी ही किरपा से साँसे हूँ भरती , लगे जो बनाना मुझे वो बना दे , जो चाहे मिटाना तो मुझको मिटा दे , मगर अपने आँचल मे मुझको जगह दे | चरणों मे बैठूँ चरण बन के तेरा , बसे मन मे मेरे हो तेरा ही डेरा |"
-Ruchi Dixit