1 आँचल
बसें किसी भी देश में, शहर रहें या गाँव।
ममता का आँचल सदा, देता सबको छाँव।।
2 आनन
आनन-फानन चल दिए, पूछ न पाए हाल।
सैन्य-बुलावा आ गया, था संकट का काल।।
3 अलकें
अलकें छू कर गाल को, देतीं प्रिय संदेश।
धैर्य रखो प्राणेश्वरी, बदलेगा परिवेश।।
4 आँखें
आँखें राह निहारतीं, प्रियतम की हर रोज।
दर्शन पाकर झूमतीं, मुख मंडल में ओज।।
5 अधर
अधर फड़कते रह गए, बुझी न दिल की प्यास।
सीमाओं पर चल दिए, जगा गए फिर आस।।
मनोज कुमार शुक्ल " मनोज "
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