बहुत मशरूफ है ज़माना, वक्त कहाँ है उसे, किसी के लिए
दो प्रेमभरी मीठी बात सुनानेका, वक्त कहाँ है हमे औरों के लिए
किसी औरके लिए कुछ कर जानेका; वक्त कहाँ है हमें, गैरोके लिए
किसीके आँसू पोछनेका; वक्त कहाँ है हमें, दुखियारों के लिए
अरे हमे तो आजकल फुरसत नहीं, हमारे अपनो के लिए भी ।
हे इंसान इतना भि मशरूफ न बन तू, कुछ तो कर जा अपनों और गैरों के लिए
Armin Dutia Motashaw