-By. Dr.ram manohar lohiya..
The only person who praised draupadi after mahabhabhat.
द्रौपदी से बढ़ कर भारत की कोई प्रखर – मुखी और ज्ञानी नारी नहीं . कैसे कुरु पक्ष के सभी को उत्तर देने के लिए ललकारती है कि जो आदमी अपने को हार चुका है क्या दूसरे को दांव पर रखने की उसमें स्वतंत्र सत्ता है ?
अर्जुन समेत पांचों पांडव उसके सामने फीके थे. यह कृष्णा तो कृष्ण के ही लायक थी. महाभारत का नायक कृष्ण , नायिका कृष्णा. कृष्णा और कृष्ण का संबंध भी विश्व – साहित्य में बेमिसाल है. दोनों सखा – सखी ही क्यों रहे. क्या सखा – सखी का सम्बन्ध पूर्व रूप से मन की देन थी या उसमें कुरु – धुरी के निर्माण और फैलाव का अंश था ? कृष्ण और कृष्णा का यह संबंध राधा और कृष्ण के संबंध से कम नहीं , लेकिन साहित्यकारों और भक्तों की नजर इस ओर कम पड़ी है. हो सकता है कि भारत की पूर्व – पश्चिम एकता के इस निर्माता को अपनी ही सीख के अनुसार केवल कर्म , न कि कर्मफल का अधिकारी होना पड़ा , शायद इसलिए कि यदि वह वस्य कर्मफल-हेतु बन जाता , तो इतना अनहोना निर्माता हो ही नहीं सकता था. उसने कभी लालच न की कि अपनी मथुरा को ही धुरी – केंद्र बनाये , उसके लिए दूसरों का हस्तिनापुर ही अच्छा रहा. उसी तरह कृष्णा को भी सखी रूप में रखा , जिसे संसार अपनी कहता है , वैसी न बनाया. कौन जाने कृष्ण के लिए यह सहज था या इसमें भी उसका दिल दुखा था .
कृष्णा अपने नाम के अनुरूप सांवली थी , महान सुंदरी रही होगी. उसकी बुद्धि का तेज , उसकी चकित हरिणी आंखों में चमकता रहा होगा. गोरी की अपेक्षा सांवली, नखशिख और अंग में अधिक सुडौल होती है . राधा गोरी रही होगी. बालक और युवक कृष्ण राधा में एकरस रहा. प्रौढ़ कृष्ण के मन पर कृष्णा छायी रही होगी, राधा और कृष्ण तो एक थे ही. कृष्ण की संतानें कब तक उसकी भूल दोहराती रहेंगी- बेखबर जवानी में गोरी से उलझना और अधेड़ अवस्था में श्यामा को निहारना.
रामायण की नायिका गोरी है. महाभारत की नायिका कृष्णा है. गोरी की अपेक्षा सांवला अधिक सजीव है. जो भी हो , इसी कृष्ण – कृष्णा संबंध का अनाड़ी हाथों फिर पुनर्जन्म हुआ. न रहा उसमें कर्मफल और कर्मफल हेतु त्याग. कृष्णा पांचाल यानी कनौज के इलाके की थी , संयुक्ता भी. धुरी – केन्द्र इन्द्रप्रस्थ का अनाड़ी राजा पृथ्वीराज अपने पुरखे कृष्ण के रास्ते न चल सका . जिस पांचाली द्रौपदी के जरिये कुरु – धुरी की आधार – शिला रखी गयी , उसी पांचाली संयुक्ता के जरिये दिल्ली – कनौज की होड़ जो विदेशियों के सफल आक्रमणों का कारण बना. कभी – कभी लगता है कि व्यक्ति का तो नहीं लेकिन इतिहास का पुनर्जन्म होता है , कभी फीका कभी रंगीला. कहां द्रौपदी और कहां संयुक्ता , कहां कृष्ण और कहां पृथ्वीराज , यह सही है. फीका और मारात्मक पुनर्जन्म , लेकिन पुनर्जन्म तो है ही .