साधारण प्रेम आदमी को इतना पागल बना देता है, तो परमात्मा के प्रेम का तो फिर कोई हिसाब लगाना संभव नहीं। और दोनों में जो फर्क है वह परिणाम का ही होता तो भी ठीक था, वह गुण का फर्क है। मात्रा का ही भेद नहीं है। ऐसा नहीं है कि यहां छोटा-सा प्रेम है और इसी का बड़ा रूप परमात्मा का प्रेम है। मात्रा का ही फर्क नहीं है, गुण का फर्क है। वह प्रेम किसी और ही आयाम में है। वह प्रेम परिपूर्ण प्रेम है। वह प्रेम शाश्वत प्रेम है। वह एक दफा घटता है तो घटता है, फिर मिटता नहीं। यहां तो प्रेम बनते हैं, मिटते हैं, पानी के बुलबुले हैं। पानी केरा बुदबुदा! क्षणभंगुर है। सुबह खिले फूल, सांझ मुरझा जाते हैं। वह तो ऐसा कमल है जो कभी मुरझाता नहीं–स्वर्ण कमल है। और उसकी आंख में आंख मिल जाए, उसके दिल के साथ दिल जुड़ जाए, उसके हाथ में हाथ आ जाए, उसके नाच में नाच हो जाए, उसके साथ रास-रस जाए तो पागल न होओगे तो क्या होगा? होश संभालकर रखोगे कैसे? होश संभालकर रखोगे कहां? होश संभालकर करोगे भी क्या? इसलिए वहां होशियार नहीं पहुंच पाते, वहां दीवाने पहुंचते हैं! वहां गति दीवानों की है। होशियार तो बाहर ही रह जाते हैं मंदिर के। जहां तुम जूते उतार आते हो होशि