शहर खाली है।
कोई है ही नही वहा
जहा गुजरती थी गालिब और मीर की यादें
ख्वाबों की कंखियो से
उनकी जगह अब यादव हलवाई की रेड़ी लगती है।
वक्त बदलता गया और शहर ने भी बड़ी आसानी से करवट बदल ली।
कम्बक्त जिंदगी सिर्फ सिमड़ी चासनी के जैसे ही रह गई।
शहर चला था रोजगार ढूढने दूसरो के खातिर
खुद बखुद बेरोजगार हो गया।
शहर खाली है
कोई नही वहां।
चांदनी चौक मदीना बाजार
पुरानी दिल्ली और रोशन गलियां।
कई और नामचीन्ह जगह जिनका जिक्र सिर्फ हिज्र के कोने में ही है।
चारो तरफ सिर्फ धुआं ही धुआं।
धुआं हवस का,पैसे का, जिस्म की घटती रोशनी,
पाने की होड़ में कितना कुछ गवा बैठा
सब कुछ नशे में तब्दील हुआ है।
अब कोई नही सिर्फ गंदगी और कचरा है वहा।
शहर खाली है।
कोई नही वहा।
देश प्रेम के नाम पर कितना कुछ खिंच गया
शहर तो शहर कुछ गांव में भी बट गया।
क्या नेता क्या संतरी
क्या नौकर क्या मंत्री
सब खा रहे और शहर और गांव को कूड़ेदान बना रहे।
गुलजार हुआ करता था कभी बेकार पड़ा गुल
अब गुलिस्तान बहुत है मगर गुलजार कहा है। ये पता नही।
कुछ था उस जमाने में जहा कुछ अर्शे बीते है।
अब वो दौर कहा अब वो रंग नही।
अब वो शहर कहा वो अब वो संग नही।
शहर खाली है वहा कोई नही।
शहर का उल्टा अनुवाद जो होता है
दरअसल वो तो अब गुमनाम है।
शहर खाली है।
वहा कोई नही।