दिवालीकी रात होती है काली अंधियारी, पर हर तरफ जगमगा रही है बहुत सारी दीपमालाए
इस काली अंधियारी रात में, तेरी याद में, जलाया है मैने भी तेरे लिए एक दीपक, शायद तू यह देख पाए
दिल के कोनेमें एक आश छिपी है, मैं तुझे देख न पाउ, पर शायद तू आकाशसे उसे देखे, और यहाँ आये
कहते हैं लोग, के जो स्वर्ग सीधारता है, वो आकाशमें बन जाता है एक खूबसूरत तारा;
पर देख रही हूं मैं, आकाश खाली पड़ा है सारा; अरे, पर हां, अब दिख रहा है मुझे बस एक ही सितारा
पूरे घने काले मखमली आकाशमे, वो अकेला चमकता सितारा, दिख रहा है, बड़ा ही अनमोल और प्यारा ।
जीवनके बिखर गए हैं सब रंग
दिलमे नहीं है कोई उमँग, अचानक मानो हो गया है जीवन बेरंग;
फिरभी करती हूं मैं यह दीपक तुझे अर्पण, आशा और उम्मीदके एक छोटेसे किरण के संग ;
करती हूं एक प्रार्थना भगवानजीसे, तू जहाँ है वहाँ चौ तरफ हो बिखरे, खुशालीके रंग, वहाँ हो उत्साह और उमंग।
किस्मतसे टक्कर लेने की किसे है हिम्मत और ताकत, बिछड़ गए हैं अब, न जाने मिलना होगा कब;
कब या कभी नहीं यह भी नहीं मुझे है पता; अब तो अकेली हु मैं, भगवान ही जाने, मिलना होगा कब !
Armin Dutia Motashaw