ना बातें होती थीं
ना मुलाकातें होती थीं,
बिना चेहरा देखे महिने बीत जाते थे,
बिना आवाज़ सुनें नींद भी कहाँ आती थीं,
ख़त आता था महबूब की खबरें लाता था,
भारत माँ का बेटा था अपना फर्ज भी निभाता था,
महिनों तक एक आस रहती थीं,
इस साल की छुट्टियाँ साथ मनाने का वादा था,
छुट्टियाँ तो कहाँ मिलतीं हीं थीं ज़वान साहेब को,
मिलता तो था हमें उनका लिखा हुआ पुराना ख़त।