अखण्ड ज्योति प्यार की जली हुयी थी
मैं प्यार के आगे सो न पाया,
कुछ मन में सौन्दर्य पड़ा हुआ था
कुछ तन पर सौन्दर्य चमक रहा था।
किसे सुख-दुख कहते हैं
प्यार के आगे समझ न पाया,
जितना आगे मैं जाता था
उससे आगे स्नेह रहता था।
जीने का अनुभव अद्भुत है
इसका ज्ञान सबको है,
कौन जिया, कौन मरा
यह नियम तो शाश्वत है।
बहुत चला,बहुत थका
पर प्यार के आगे सो न पाया,
तुम कहते हो जी कर देखो
प्यार कहता है मर खर देखो।
* महेश रौतेला