बँटवारा
बढती ही जा रही है
जीवन में जटिलता।
बढती जा रही है
आदमी की व्यस्तता।
दूभर हो रहा है
संयुक्त परिवार का संचालन।
हो रहा है विघटन ।
जब होता है मनभेद
तब होता है बंट्वारा
बढते है मतभेद
आपस में हल नही होते विवाद।
न्यायालयों में होता है
कीमती समय बर्बाद।
पारिवारिक व्यापार
होने लगते है चौपट,
बढती है खटपट।
आर्थिक क्षति से बचाव,
सामाजिक शांति और
सद्भाव के लिये
बहुत आवश्यक है
एक तटस्थ न्यायालयीन निकाय।
जहाँ समस्या समय सीमा में
सुलझा ली जाय।
ऐसा होने पर रूकेगी आर्थिक क्षति
नही पनप सकेगा पारिवारिक विवाद
खण्डित नही होगी पारिवारिक एकता
सुदृढ बनेगा हमारा समाज
तब हर घर में चमकेगा
प्रेम और साहचर्य का ऐसा सूरज
जिसका सूर्यास्त कभी नही होगा।