1 -जो भी समझो
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उम्र के झरोखे को खोल न जाने
वो कहाँ टहलती निकल गई ---
बादलों के उस पार या फिर धरती और आकाश के उस छोर पर
जहाँ न कोई सुनने वाला न ही सुनाने वाला---
मन के बादलों के बीच चीत्कार करती कड़कदार बिजली सुन
अचानक चौंककर अपने होने के अहसास को टटोलती वह सुनती रही ,
उन सभी को जो न जाने कहीं दूर से पीट रहे थे ढोल ---
इन्द्रियों की उलझन से, शिथिल मन से उद्वेलित शब्दों का कफन पहन
आधी मरती,आधी जीती रही ---अब ---
जो भी लोग कहें वह जानती थी ,
उसकी साँसें चल रही थीं ,
दे रहीं थीं प्रमाण उसके ज़िंदा रहने का ------| |
Dr.Pranava Bharti