प्रकृतिकी रीत
मौत धीरे धीरे पास आ रही थी, मानो जान हाथोंसे छूट रही थी
प्रकृति ने हस कर कहा, यही उसकी रीत, एकदम सही थी;
भला, नदी कब सगरसे निकालके पहाड़ की तरफ बही थी !
प्रकृतिने कभी भी, युगोसे, ऐसी कहानी कही नहीं थी ;
बचपन गया, जवानी ढली, वृद्धावस्थामे जान हाथोंसे छूट रही थी;
मानो, बुढापा कह रहा हो, रेत हाथोंसे फिसलती नज़र आ रही थी ।
यही है प्रकृति का नियम, यही जीवनकी रीत, सही थी।
अब तो दिख रहा है, मौत पास आ रही थी, और जान दूर जा रही थी।
Armin Dutia Motashaw