शीर्षक: वो, कह नहीं पाते
जिंदगी को है, मंजिल की आदत
दिल को, रुतबों- नाम की चाहत
आत्मा को चाहिए, दुःख से राहत
न जाने, अति सबसे बड़ी आफत
मंजिले, दूर तक साथ नहीं चलती
रुतबों की, उम्र भी लंबी नहीं होती
सूख गये फूल तो, चुभन सी होती
सब कुछ मिले, शर्त ये नहीं चलती
मंजिल कर्म हो, तो सब हासिल होता
संयम हो, तो जीवन का रुतबा बढ़ता
सुख-दुःख, सही अस्तित्व बोध कराता
यकीन करना, तभी ये जीवन कहलाता
मंजिलों के शौकीन, इंसान नहीं रहते
रुतबों की चाहत में, सब कुछ ही खोते
फूलों की माला, चंद समय न झेल पाते
अफसोस तमाम उम्र का, वो, कह न पाते
✍️ कमल भंसाली
-Kamal Bhansali