क्या कहिए अब लफ्ज़ फिसलते है,
अरमाँ ए दिल बार बार फिसलते है;
बेदर्द कैसे रहै , हमदर्द दोस्ताना,
जख्म याराना , सुकुन फिसलते है;
परदादारी हुनर होता है लाजवाब,
बेपर्दा हो जाएं ,तो राज़ फिसलते है;
होश में कहां जीते हैं , हकीकत में,
रुहानी आलम में बेहोश फिसलते है
आनंद कैसे जीते, बाज़ी जिंदगी की,
यहां इन्सान , बात बातमें फिसलते है;
-મોહનભાઈ આનંદ