शीर्षक: राहत
अभी, अभी वो, दस्तूर निभा कर गये है
प्यार को खामोशी से जताकर गये है
बेवफाई के सारे इल्जाम लगा कर गये है
बिस्तर पर सलवटों की सौगात छोड़ गये है
ताज है, वो मेरे, ये अहसास दे गये है
अधूरी सी प्यास को, खाली जाम दे गये है
उनके बिना नींद न आये, अनचाहे विश्वास दे गये है
क्या कहती मैं, खाली बिस्तर पर करवटे बदल गये है
हर जुदाई भी, प्रेम की कोई रीत निभानी होती होगी
मुरादों से मिली मुलाकात, जिस्म की कोई जीत होगी
न भीगे मन तो क्या ? धूप में छाँव की प्रीत तो होगी
अभी अभी वो गये, ये भी कोई राहत की बात होगी
✍️ कमल भंसाली