क़त्ल कर दो मेरा,मेरी ख्वाहिशों की बजाय,
न मैं रहूँगी, न मेरे अरमान कभी जागेंगे।
ख़त्म कर दो एक बार में कहानी मेरी,
रोज -रोज के सारे झंझट ही मिट जाएंगे।
तमाम तुमको शिकायतें, मुझे भी शिकवे हैं,
अब मजबूरी के रिश्ते नहीं निबाहेंगे।
मुनासिब है रास्ते ही बदल लेते हैं,
इन पथरीले राहों पर कबतक भागेंगे।
ये हकीकत है आज के जमाने की,
आसान होगा जीना जो समझ जाएंगे।
कोई मुकम्मल नहीं, सबमें हजार कमियां हैं,
फ़िजूल बातों पर कब तलक रोएँगे।
चलो छोड़ो इन बेकार के फसानों को,
थोड़ा हँस लें,वरना यूँ ही दफ़न हो जाएंगे।
रमा शर्मा 'मानवी'
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