यूँ रोज़ाना इन दीवारों पे तसवीर बदल जाती है
और रोज रोज दिलोंकी तकदीर बदल जाती है
दिलोंमें उमड़ रहे जूनून की आरज़ू और जज्बातोँ के
हुक्म की न जाने क्यूँ यकलख्त तामीर भी बदल जाती है
मज़मा-ए-कायनात से मेरा दफ्फ्तन तनहा हो जाने पर
खुदसे मिलके न जाने क्यूँ खुदकी तासीर बदल जाती है
तमाम अमादगी के बा-वजूद न जाने क्यूँ हर किसी की
सामयीन के सामने तमाम तकरीर बदल जाती है
इंतज़ारके बाद तेरा यूँ यकदम आना मुझ गरीब की
न जाने क्यूँ जिस्म-ओ-जान की जागीर बदल जाती ही
उनकी "परम" रूह का मेरी रूह को यूँ छू कर देखना
मुज "पागल" की पेशानी की सिलवट बदल जाती है
ગોરધનભાઈ વેગડ(પરમપાગલ)
यकलख्त /तामीर=sudden /obey to order
मज़मा-ए-कायनात=crowd
दफ्फ्तन=suddenly
अमादगी=preparation
सामयीन=Audience
पेशानी=forehead
सिलवट=crease