फैली हुइ बांहों में वो आया भी नहीं है,
ख्वाबों में जीसे देखा उसे पाया भी नहीं है।
अबतो मेरी कीस्मत ही नया रंग दीखाये,
नजरों में कोइ ओर समाया भी नहीं है।
अपनी ये खुशी रास नहीं आइ जहां को,
इतना किसीको हमने सताया भी नहीं है।
इस दर्जा मिले जख्म खुशी दिल ने जो चाही,
हमदर्दी का सरपे कोइ साया भी नहीं है।
दर दर की मुसाफत में रहा गमसे गुजारा,
उमीद के दामन को छुडाया भी नही है।
चलते उसी जानिब ये कदम बढ़ते गये हैं,
दिल से तेरी यादों को भुलाया भी नही है।
मासूम निगाहों की तलब बुज नही पाइ,
सुरत को अभी उसने दीखाया भी नहीं है।
मासूम मोडासवी