कल्पतरु के छाँव तले अचेतन मन में।
खोजता मरीचिका कस्तूरी उपवन में।
श्रमशील संघर्ष प्राणी का उपमेय।
पग पग धैर्य सीखता जीवन में।
प्रस्फुठित ह्रदय हूक सी उठती है
मंजरी से बेचैन लागे चितवन में।
शनै शनै गतिउत्तर मद्धिम प्रकाश
खोजता स्वयं को प्रीति के मधुवन में।
क्या गरल क्या सरल जनहित में
हरि भक्ति में पीड़ा विरह नैनन में।
पथहीन पथिक विचरण करत।
दिशाहीन भटकत कानन में।