ज़मीं पे शिकायतो का दौर चला है ,
लगता है जमाना करवट ले रहा है ।
आशा और उम्मीद दोनो कसोटी पे है ,
इंसान अपनी कब्र खुद खोद रहा है ।
कल तक जिन पन्ने को रटे जा रहें थे ,
आज उन्हीं में शक पैदा हो गया है ।
लौ जरूर टिमटिमाती है बुझने से पहले ,
फिर भी हम उसे हवा दिये जा रहें हैं ।
यकीनन साकी का हुनर बदल गया है ,
पैमाने हलक तक डालें जा रहे हैं ।
आदमियत का उद्धारक खुद आदमी है ,
ज़माने से नबी ये बात कहते जा रहे हैं ।
सुकनवर हों सकें उतनी ही जरुरतें पाल लो ,
दो गझ ज़मीं में आशियाने नहीं समां सकते ।
अधुरे ही सही सपने , उसे संजोए रखो ,
पकने पर तो फुल भी गिर जाया करते हैं ।