अँधियारा भरकर जीवन में हमने क्या कमाल कर डाला
सिसक उठे हैं पीड़ा से फिर ढूंढ रहे हैं यहाँ उजाला
ऐसा कुछ कर जाएँ अब तो जीवन में हों सबके खुशियाँ
धरती-अम्बर नृत्य करेंगे देख स्नेह का रंग निराला
एक पिता है हम सबका ही क्यों हम भूल गए सच्चाई
संपत्ति बाँटी हर मन में स्नेह,प्यार और दी करुणाई |
डॉ .प्रणव भारती