आज देखा मेने उसे पर मुझे रकीब नजर नहीं आया
शायद उसे रकीब की मुहब्बत पर भी सबर नहीं आया
शब-ए-हिज्र काटि थी हम दोनों ने और मोत से गुजरे
मैंने बावजूद इसके ईतना पुकारा उसे पर नहीं आया
ईतनी दफा पुछा मैंने उससे अपने हिज्र का सबअब
उस वफादार बेवफा के मुहं से जहर नहीं आया
सच बोल बोल कर तुम तो खुद के भी नहीं रहे आदि
बहुत कोशिश की मगर ये फरेब का हुनर नहीं आया