बहुत खुश थी कोमल अंग जैसे गुलाब सा खिल गया हो
हिरण सी बैचेन आंखे खुद में ही शरमा रही थी
कैसी लगुंगी लाल जोड़े में दुल्हन के श्रृंगार में
नया सा एहसास जैसे समय को पंख लग गया हो
पिया से मिलन के एहसास से मन जैसे मयूर बन गया हो
सोच कर शरमा रही थी कि ....मां ने प्यार से सर पर हाथ फेर कर कहा ....परेशान मत हो बेटी मां है तेरे साथ
उफ्फ.....एकदम से आंसू आगये ..अब ये हाथ मेरे सर पर इस तरह नहीं होगे
कैसे 21 साल के रिश्तों को में छोड़ पाऊंगी ,कैसे उस आंगन को छोड़ जा पाऊंगी
अब ज़िद किस्से करूंगी मां की नन्ही सी गुड़िया अनजानों के बीच कैसे रह पाएगी
अब कौन मेरे सो जाने पर उठा कर मुझे खिलाएगा
अब कैसे पापा के मजबूत कंधे का सहारा मिलेगा
नहीं मां मुझसे ये नहीं होगा पापा गुड़िया बड़ी नहीं हुई है
तुम बिन कैसे जियुंगी , तुम गुड्डा घर ले आओ मैं कहीं नहीं जाऊंगी