कबीर साहेब की साखी
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माला तिलक लगाय के, भक्ति न आई हाथ।
दाढ़ी मूंछ मुंडाय के, चले दुनी के साथ।। 3 ।।
माला पहन ली और तिलक लगा लिया, परंतु इससे भक्ति प्राप्त नहीं हुई। दाढ़ी-मूंछ भी मुड़वा ली और दुनिया के साथ चल पड़े, इससे कुछ भी लाभ नहीं हुआ अर्थात केवल बाहर के प्रदर्शन मात्र से भक्ति नहीं होती, यह तो स्वयं को तथा औरों को भी धोखा देने वाली बात है। अतः आंतरिक मन को संयमित करो।
सत साहेब बंदगी👏🧎🏻👏