कबीरसाहब की बानी
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जो घर कथा कीरतन नही संत नही मिजमाना
तो घर जमड़े डेरा किया सांज पड़े समशाना
फूल्यो फग्यो इंहा फिरत है क्या दिखलावत अंगा
एक पलक में फना होयेगा जैसा रंग पतंगा
नाभि कमलमे नाव चलत है द्वादश मीन ठेराना
अधर तख्तका देखा तमासा सोइ स्तगुरुकी साना
मेरी मेरी कर कर मूरख मिटो नही मान गुमाना
कहत कबीर सुनो भाई साधो किस विध होय कल्याणा
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