ख्वाब जब भी देखा तो इस क़दर टूटा कि फिर देखा न गया।
उसकी तस्वीर के किये इतने टुकड़े मगर मुझसे फेंका न गया।
कसूर मेरा इतना था कि मैंने चाहा था उसे टूट कर।
थे मेरे आस-पास यूँ तो बहुत अज़ीज़ मगर किसी औऱ की तरफ मुझसे देखा न गया।
मैं भटकता रहा "अर्जुन" मंज़िल की तलाश में ।
सोंचा रुक कर किसी से पूछ लूँ मगर मुझसे किसी को रोका न गया।