रचना
इन खंडहरों को छूना, छू कर के देखना
सांसों को सुनना इनकी, चुप्पी को देखना
चुपचाप बह रहे हैं, आंसू को देखना
इन्सां की उंगलियों के, निशान देखना
ज़िंदा विरासत खो रही है अपनी कहानी
सांझी विरासत बोल रही है अपनी ज़ुबानी
पत्थर की जालीयों में फूलों को देखना
सूरज में तपी ईंटें, मिट्टी की देखना
चूने की ये आराईश, लिपाई देखना
गरमी में चांदनी सी, ठंडक है देखना
सदियों से सर उठाये, खड़े हैं देखना
हर इक खंडहर ताजमहल सी प्यारी निशानी
सांझी विरासत बोल रही है अपनी ज़ुबानी
बच्चों की तरह खंडहर, सोये हैं देखना
बूढ़ों की तरह सर पे, साये हैं देखना
ये मां की तरह खंडहर, जागें हैं देखना
ये साथीयों से खंडहर, आंखों में देखना
बरसों से हाथ थामे, चले हैं देखना
फिर भी मिटायें आज इनकी, क्यूं हम निशानी
ज़िंदा विरासत खो रही है अपनी कहानी
ईरान की ये मिट्टी, मुलतान की ये मिट्टी
मिट्टी कज़ाखीयों की, अफ्रीकीयों की मिट्टी
ये लाल काली मिट्टी, हिंदोस्तां की मिट्टी
ये एक एक ज़र्रा, सारी हमारी मिट्टी
आओ कदम बढ़ायें, फिर से सजायें मिट्टी
तोड़ ना दे दम कहीं पे अपनी कहानी
सांझी विरासत बोल रही है अपनी ज़ुबानी
ज़िंदा विरासत खो रही है अपनी कहानी
विनय – चारूल