पिछले कुछ दिनों से कुछ तो कहना चाह रहा था लेकिन शायद शब्दों का चयन नहीं हो पा रहा था या फिर शब्दों में ढाल नहीं पा रहा था...
और सच कहूँ तो अभी भी लफ़्ज़ों को ढूंढ ही रहा हूँ...
अक्सर ऐसा होता है कि हम कुछ कहना तो चाहते हैं लेकिन कह नहीं पाते हैं...जेहन में बहुत कुछ चल तो रहा होता है पर व्यक्त नहीं हो पता...
ऐसा लगता है कि ऐसे मौकों पर ज़िन्दगी शायद ये समझाना चाहती हो कि जो हम सोच रहे हैं, ज़रूरी नहीं है कि वो कहा भी जाये...
या फिर कहा जाये कि ज़िंदगी ये कहना चाहती हो कि खामोशी बहुत बार शब्दों से ज्यादा बेहतर होती है या
फिर खामोशी ही बेहतर होती है!!!
उफ़्फ़...ये जिंदगी भी ना!!!
© रविश 'रवि'