विषय .पतंग ,विधा .कविता *** ..................
पतंग सदा आसमान ,में ऊँचा उड़ता ।
अपनी निराली छटा ,से सबका दिल मोहता ।।
लोगों के इशारे पर ,आकाश में नाचता ।
किसी के इशारे पर ,कट कर नीचे गिरता ।।
अस्तित्व हीन होकर ,धूलधूसरित होता ।
हमारा जीवन भी ,पतंग जैसा ही होता ।।
हमारे पतंग की डोर ,ईश्वर खुब चलाता ।
वह जैसा चाहे वैसे ,हमें नाच नचाता ।।
हमें उसके इशारों ,पर नाचना ही पड़ता ।
आज मानव फिर ,असहाय सा होता ।।
उसका जीवन तो ,पल भर का ही होता ।
फिर भी वह दिल के ,आकाश में इतराता उड़ता ।।
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