जाने कितने ?
----------------
जाने कितने सफ़र हुए हैं जाने कितनी उमर बची है
तन्हाई के इस मौसम में जाने कितनी साँझ रुकी है ---
संध्या का बौराया मुखड़ा मुझे खींच-खींच ले जाता
विगत दिनों की हलचल का ही मन का कोना-कोना गाता
जाने कितने क्षण बाक़ी हैं जाने कितनी डगर बची है ----
शाश्वत प्रश्नों की पंक्ति में खड़ा स्वयं को मैं पाती हूँ
शब्द-शब्द फिसला जाता है मैं न उसे पकड़ पाती हूँ
कभी रूठ जाता है मुझसे जाने कैसी नाराज़ी है---
जाने कितने गलियारे हैं मन के अंधियारे के भीतर
फँसे जा रहे भाव निगोड़े भटक रहा है मनवा दर -दर
जाने कदम कहाँ ले जाएँ यूँ तो मखमल की जोड़ी है ----| |
डॉ.प्रणव भारती