कभी कभी मुझे यक़ीन ही नहीं होता।
के आज मैं कुछ लिख पा रहा हूँ।
इसका सारा श्रेय तुमपे जाता हैं।
सही बताऊँ, तुम्हें जब जब याद करता हूँ
मोतीयों के हार जैसे शब्दों का हार खुदबख़ुद बन जाता है।
जब तुम ना हो, तो कुछभी नहीं सुझता।
जब से तुम मुझे मिली हो मेरा दिल मेरा बस मे नही | ये दिल बस तुम्हे खुश देखा चाहता है |
जब तुम खुश होती हो तब सारी कायनात खुश नजर आती है ओर जब तुम उदास होती हो, तब मुझे अपने आप पर नफरत होने लगती हैं |
कैसे बताऊँ के, तुम मेरे लिये क्या हों।
पर जैसे भी हो, मैं तुम्हें पैग़ाम तो भेज सकता हूँ।
तुम इसी तरह मुस्कुराते रहना और मैं तुम्हें शब्दों का हार पहनाते जाऊँ।
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