आज मैं अपने ही विचारों में कहीं भटक रही थी
और मेरे मन के भीतर कुछ बातें खटक रही थी।
तभी मुझे कहीं कुछ आवाज दी सुनाई,
अरे! यह तो थी हमारी राष्ट्रभाषा की करुण रूलाई।
वह अपनी व्यथा मुझे सुना रही थी,
उसकी दुर्दशा देख कहीं शर्म सी मुझे आ रही थी।
वह बोली कभी मैं हिंदुस्तान की शान हुआ करती थी,
भारत का सम्मान हुआ करती थी,
पर आज हूं मैं अपने ही देश में पराई। वह बोली....
कबीर, रहीम, तुलसी, रसखान की भक्ति हूं मैं,
विद्यापति, भूषण, मतिराम की श्रृंगारित कृति हूं मैं।
दिनकर की ओजस्वी वाणी, सुभद्रा की "झांसी की रानी"
बच्चन की "मधुशाला" हूं , मुंशी के "गोदान" की करुण कहानी,
दिनकर की "रश्मिरथी" मैं ,शरदचंद्र के "देवदास" में प्रेम की अमिट कृति हूं मैं।
पर आजकल के लोग तो विलियम शेक्सपियर को ही अपना आदर्श बनाते हैं,
Hamlet, Romeo and Juliet और Macbeth को पढ़कर ही अपना साहित्यिक ज्ञान बढ़ाते है।
हिंदी साहित्य के वृहद ज्ञान को पढ़ने से कतराते हैं।
अब तो लोग मुझे सिर्फ 14 सितंबर को बुलाते हैं,
आयोजनों के नाम पर लाखों का बिल बनाते हैं।
फिर भी मेरे आत्म सम्मान को वह बचा नहीं पाते हैं
और अगले 14 सितंबर तक मुझे वही दफन कर जाते हैं ।
माना कि अंग्रेजी अंतर राष्ट्रीय भाषा है,
ज्ञान इसका आवश्यक है,
पर रखो इसको शिक्षा तक सीमित,
शिष्टाचार की अपनी यह नहीं परिभाषा है।
क्योंअंग्रेजी माध्यम का बच्चा हिंदी की गिनती नहीं बोल पाता है,
गुड मॉर्निंग सर बोलने पर फक्र से फूला नहीं समाता है और नमस्कार सर सुनने पर स्कूल का सिर क्यों शर्म से झुक जाता है।
क्यों हिंदी में बात करने पर बच्चों को स्कूल में सजा सुनाई जाती है,
और चार अंग्रेजी के शब्द जिसका शायद अर्थ भी उसे पता न हो बोलने पर उसकी पीठ थपथपाई जाती है।
आजकल हर कोई क्यों अपने बच्चों को सिर्फ अंग्रेजी बोलते देखना चाहता है
और "तुम्हारी तो हिंदी हो गई" तिरस्कार सूचक एक मुहावरा बन जाता है।
अगर यही हालात रहे तो कौन मुझे अपनाएगा और एक दिन मेरे अस्तित्व पर पूर्णविराम लग जाएगा।
इतना बोल कर हिंदी पुनः सुबकने लगी और कातर नजरों से मेरी ओर वह तकने लगी।
मैंने उसकी तरफ अपना हाथ बढ़ाया और उससे मुखातिब होकर यह फ़रमाया....
हम आने वाली युवा पीढ़ी अब तुम्हारा मान बढ़ाएंगे, करेंगे तुम्हें मुक्त इस नागपाश से और तुम्हारे लिए संजीवनी बूटी हम बन जाएंगे।
हिंदी में ही हम बात करेंगे और हिंदी को ही सुनना चाहेंगे।
Good morning की जगह अब नमस्कार या शुभ प्रभात को अपनाएंगे।
निज देश में ही नहीं वरन् सम्पूर्ण विश्व में तुम्हें तुम्हारा उचित स्थान हम दिलाएंगे।
🖋️"प्रज्ञा चांदना"