तिलिस्म /आभा दवे
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जब से जग ने तिलस्म को जाना है
तब से उसके भेद को पहचाना है ।
हुस्न की आँखों का तिलस्म क्या कहना
हर कोई इसका देखो बन गया दीवाना है ।
दुनिया तिलस्म की बहुत ही निराली है
न जाने इसका किस दिशा में ठिकाना है ।
वो तिलस्मी मुस्कान हर लेती है हर पीड़ा
मात- पिता के बच्चे ही उसका खजाना है ।
माँ की ममता तिलस्म से कम नहीं होती
उसके चरणों में ही सदा शीष झुकाना है ।
आभा दवे
मुंबई