कुछ लोग वादा तो करलेते हैं पर निभाने केलिए फुरसत् नहीं होती है । पुछने से बाहाना बनाते हैं पर मानते नहीं है । और हम है की उमीद लगाकर बैठे है, जबकी उनको हमारी याद तक नहीं है । बस् मेरी एक सबाल है । अगर वादा निभाना नहीं आता है तो क्युं करते हो ? अगर साथ रेहना ही नहीं है तो दिखाबा करते हो ? मुहँसे बोल दो ना चलेजायेगें हम, मगर खामोशी बरदास् नहीं करपायेगें हम ।