तुम पंख मेरे काटोगें तो में होंसले की बुलंदियों से अपनी उडान भरुँगा,
तुम जीतनी बार मुझे तोड़ोगे उतनी बार में फिर जुड़ जाउँगा,
और,
तुम जीतनी बार मुझे गीराओगे उतनी बार में खड़ा हो जाउँगा,
क्यूँकी मैं वोह परिंदा हुँ जिसकी खुद की हिम्मत है,
मैंने हारता रहूँगा क्यूंकि जीतने का जज़्बा हर वक़्त ज़हन में हु रखता.....