जिसे आप धर्म कहेते है,
यदि,
धर्म के रक्षक जब अंहकारी हो जाते है,
तभी,
केवल धर्म का हीं नहीं स्वयम् का भी अस्तित्व मिट जाता है,
पांडु पुत्रो सही नहीं थे और यदि आप सही कहेते हो तो फिर महायुद्ध की घोषणाएँ पांडु पुत्रो ने क्योँ पहेले की थी,
जब माधव ने अर्जुन को कहाँ की यदि तुम हस्तिनापुर को हरा नहीं सकते तो स्वयम् से भी हार जाओगे और अभिमन्यु को तुमसे क्याँ शिक्षा मिलेगी,
पांडु पुत्र सब हार गएँ थे,मगर सब हार ने पश्च्यात दुर्योधन ने युधिष्ठिर को कहाँ था भ्राता यदि आपके पास अब कुछ शेश नहीं बचता है तो आप क्रीड़ा को यही समाप्त कर सकते हे,
किन्तु युधिष्ठिर ने अपने अनुजो को दांव पर लगया और फ़िर हार गए,
दुर्योधन ने फ़िर वही बात दोहराई मगर अब की बार उन्होंने पंचाली यानी के द्रोपदी को दांव पर लगा दिया और हार गए और भरी सभा में द्रोपदी का चीर हरण हुआ फिर कान्हा ने द्रोपदी के चीर पुरे किये और वहाँ बैठे हर एक को कान्हा ने नग्न किया ताकी उनकों पता चले की स्वयम् पर बितती हे तो केसा लगता है,
अब जो मे कहेना चा रहाँ हूँ वोह यह है की कान्हाने जब द्रोपदी के चीर पुरे तब वो प्रगट नहीं हुए थे मायावी सक्ति से चीर पुरे थे और दुर्योधन को लगा की द्रोपदी अग्नि की पुत्री हे इसीलिए उसने माया रची,वो राक्षसणी हे,और फीर दाव याने के बलराम ने कुष्ण को एसे संवाद बोले जो चेष्ठ भ्राता को बोलना शोभा नहीं देता है किन्तु दाव के संवाद सनातन सत्य थे,
कान्हा तुम क्यूँ यह युद्ध का हिस्सा बनना चाहते हो और वेह भी एसे पुरुषो के साथ रहेना चाहते हो जो स्वयम् की पत्नी और अनुजो को दांवपर लगाएँ,कान्हा में इसबार तेरा साथ नहीं दे सकता इसलिए नहीं कि मैं दुर्योधन का गुरु हुँ किन्तु इसीलिए की यह युद्ध धर्म का युद्ध नहीं अधर्म का युद्ध,
हे चेष्ठ भ्राता दाव यदि आपको केवल पांडवो का अधर्म दिखाई देता है और कौरवों का नहीं...!
क्याँ एक स्त्री को भरी सभा में चीर हरण करना अधर्म नहीं है....!!!कर्ण जो स्वयम् कुंती पुत्र है और अपने अनुज अर्जुन को भरी सभा में चुनौतियाँ देता है क्या यह अधर्म नहीं...!भ्राता दाव यदि में चाहूँ स्वयम् हीं अकेला युद्ध प्रारम्भ और अंत कर सकता हूँ, किन्तु यह धर्म के विरुद्ध होगा,सारी श्रुष्ठी का सर्वनाश हो जाएगा और ना ही पांडव बचेंगे और ना ही कौरव किन्तु यहा धर्म को न्याय कहा मिला,!आप हीं बताएँ दाव.?,
कान्हा किन्तु तुम जो कहें रहे हो और वो सत्य हे तो मुझे एक बचन देना होगा,
हा कहिए दाव क्याँ बचन चाहिए,
यदि युद्ध में तुम्हें जाना पडे तो तुम कौरवों के विरुद्ध सस्त्र का प्रयोग नहीं करोगे और ना ही पांडवो की कोई सहायता करोगें,क्योंकि तुम नारायण हो और यदि नारायण हीं सब काम करने में मनुष्य की सहायता करेगें तो उनका दायित्व और स्वयम् की पीड़ा और जरुरत को कभी समझ नहीं पाएँगे,
थिक हे दाव भैया मगर मेरी भी एक शर्त है,,,,
to be continue...