संगति का प्रभाव
महेश एक कर्तव्यनिष्ठ व मेहनती व्यक्ति था जो कि एक कारखाने में लिपिक के पद पर कार्यरत था। वह अपनी पत्नी और एक बच्ची के साथ सुखमय जीवन जी रहा था। उसके विभाग में रमेश नामक एक दूसरे लिपिक से उसकी घनिष्ठ मित्रता हो गयी। वह एक बिगडा हुआ, शराब का आदी व्यक्ति था। उसकी इस बुरी आदत ने धीरे धीरे महेश को भी जकड लिया और वह भी शराब का आदी हो गया था। वह अपनी मेहनत की कमाई के रूपये शराब में उडा देता था जिससे उसके घर में आर्थिक तंगी के कारण झगडे होने लगे। वह अपनी बेटी पिंकू को बहुत प्यार करता था।
एक दिन जब वह मदिरालय में शराब पी रहा था तभी उसके पास खबर आई की उसकी बेटी अचानक छत से गिर गई है और उसे गंभीर अवस्था में अस्पताल में भर्ती किया गया है। महेष शराब के नशे में इतना डूबा हुआ था कि उसने इसे अनसुना कर दिया और शराब पीने में ही अपना समय गंवाता रहा। जब वह देर रात्रि घर पहुँचा तो उसे पिंकू के निधन का पता हुआ। यह जानकर वह स्तब्ध रह गया कि उसकी प्यारी बच्ची अंतिम समय तक अपने पापा की याद करते हुए मृत्यु को प्राप्त हो गई।
महेश का नशा उतर चुका था और उसका हृदय व्यथित होकर उसे बार-बार धिक्कार रहा था। उसकी आँखों से अश्रुधारा लगातार बह रही थी और वह आत्मग्लानि में आत्महत्या करने के लिए संकल्प कर चुका था। यह जानकर उसकी पत्नी ने उसे रूंधे गले से समझाया कि आत्महत्या करना कायरता की निशानी है अगर आपको कुछ करना ही है तो शराब पीने की आदत को खत्म कीजिए। आपकी इस आदत ने ही हमारे परिवार के बर्बाद कर दिया और हमारी बच्ची की जान ले ली।
महेश को यह बात समझ आ गयी थी और उसने शराब छोडने का दृढ संकल्प कर लिया था। उस दिन के बाद से उसने शराब को हाथ भी नही लगाया। कुछ वर्षों पश्चात उसने अपनी बेटी की स्मृति में एक नशा मुक्ति केंद्र की स्थापना की।