हे भगवान
मेरे लिए क्या अच्छा है, क्या नहीं है,
इस में हमारी सोच इतनी भिन्न क्यों है।
तूने जो भी किया था अच्छा किया होगा
तो मेरा मन इतना खिन्न क्यों है।
पहले तो लम्बा सता कर झोली भरी,
फिर अचानक सब छीन लिया
आँगन में जो बिखरी थी कुछ कलियाँ
उन्हें यकायक मानो बीन लिया।
सूने आँगन का सन्नाटा अब मुँह बाये खड़ा है,
और मन है की कुछ भी ना मानने पर अडा है।
अब तो भगवान को इंसान बनाया जाए,
या कोई और ही भगवान बनाया जाए।
जो हमें आँखें दे पर सपने न दे,
पूरी भीड़ दे दे पर कोई अपने न दे।
न कोई मिले न कोई छूटे,
न किसी की क़िस्मत कभी भी फूटे।
ना कोई भूले ना किसी की याद सताये,
ना किसी से ज़िंदगी को कोई फ़रियाद जाये।