प्रियतम तुम
प्रियतम तुम मुझसे कहते हो ,
हम मे तुम मे कुछ भेद नहीं।
इस बात को तुम भी मान लो ,
तुम जैसे हम नेक नहीं।
प्रियतम तुम..............
प्रियतम जिस समाज को तुमने ,
धर्मो मे विरक्त कराया है।
मेरे मन की अभिलाषाओ ने ,
उससे भी परे कुछ पाया है।
प्रियतम तुम............
प्रियतम अनजानी बात है ये ,
दिल आज मेरा भर आया है।
मंदिर मस्जिद के भेद मुझे ,
आज तलक समझ ना आया है।
प्रियतम तुम............
एक प्रेम जोगन की अभिलाषा,
इतनी आसान नहीं होती है।
उस दिये की मै जलती ज्यो ,
जिसका तुमने तेल चुराया है।
प्रियतम तुम.............
प्रियतम तुम धर्म की बात करो ,
मेरी जात समझ ना आई है।
प्रियतम धर्म की ये कूटनीति ,
भला किसने इसे बनाई है।
प्रियतम तुम.........
वंदना सिंह